Saturday, 11 August 2012

मिलन घडी


मिलन घडी

मिलन घडी की ज्यों निकट आती
बिरह बेदना और बढ जाती

मन चंचल ब्याकुल
और ब्याकुल
दिल की धडकन तेज
थाह ना ले
सरपट निगाह घडी पर
अभी तो पूरा दिन बाकी
सुबह से ांय
दिन से रात का
गुजरने का इन्तजार
लम्हंे लम्बे हो जाते
कलेन्डर देखता
अभी तो महिना बाकी
मिलन की तडफन
और तडफाती
यादों का सेलाब
उमडताए घुमडता
बेग मारता
आॅखों में तस्बीर उभरती
हॅसती हुई स्वागत करती
आगोा में भरने को
बाहें खुल जाती
यका यक तन्द्रा टुटती
ठगा रह जाता
घडी मिलन की ज्यों निकट आती
बिरह बेदना और बढ जाती
10 अगस्त 2012

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