Monday, 20 August 2012

५२ अक्षरों की मैं, बिखरी माला




अ  से ज्ञ तक
५२  अक्षरों की मैं, बिखरी माला
एक दूजे का ना रूप मेरा
न स्वरूप।

अकेला ३६   व्यंजनों   में भी स्वादहीन,
१६ स्वरों के भी बेसुरा।

अप्रेम में ३६   का आंकडा,
प्रेम में ६३  का योग।

नेकमें के पदार्पण से अनेकहो जाऊं,
एकमें के बधन से एकतामें रहूँ 

गतकी से गीतमैं गाऊं,
मतकी से मीतबन जाऊं।

ना जाने कितने युग्मों के
सद विचार एभावनाओं और अनुभुतियों से 
जीवन को सजाता आया।

इसका बिपरीत भी उतना ही सत्य।

मुझे जजने वालो
आज तुम्हें क्या हो रहा,

क्यों ? “परमें को मिला कर परायेबनते,
 “बरीके साथ ऐ" जोड कर बैरीबनते।

शक्तमें गुंथों शक्तिबन जाऊं,
एकतासे ताके बिखरने से एकही रह जाऊं।

 सन्देश  मेरा सुनते जाओ,
एकतासे ताना हटाओ। 

अनेकता में एकता के 
अपने शुत्र में  फिर बंधते जाओ।

बलबीर राणा "भैजी" 
२१ अगस्त १०१२