Thursday, 9 August 2012

हमारे विकाश पुरुष







हमारे विकाश पुरुष
 देव भूमि का नाम बदल कर
 बिजली  भूमि   रखना  चाहते  हो  A
बसे  बसाये  गाँवघर उजाड़,
क्यों विस्थापन करना चाहते हो A
अपनी पौराणिक   धरोहरों पर ,
क्यों इस  तरह डाका  डालते  हो A
वजूद  मिटाने  चले  देव  भूमि  का ,
और  कितनी  त्रासदी चाहते हो A
विकाश के नाम  की  बिनाश  लीला
कब तक मचाते  जाओगे  A
प्रकृति  की चीज  छेड़  कर  
और कितने  नगर  बहाओगे A

एक  यूनिट  बिजली  दे नहीं सकते ,
कैसे  विकाश के दीप जलाओगे A
पहाड़ का पानी बहार बेचकर
कितना राजकोष बनाओगे A
भूल गए उन बलिदानों को ,
उत्तराखंड जिन्होंने बनाया है A
आज तक न्याय दे नहीं सके , 
मरहमपट्टी कब तक लगोगे A
जनता को बरगलाना,  सुर्ख़ियों में रहना,
ऐसे विकाश पुरुष कहलाते हो A
वोट मांगने के सिवाय इलाके में ,
दुबारा नजर नहीं आते हो A
कुटीर उद्योग लगा नहीं सकते ,
डामों से क्यों डुबाते हो A
स्वरोजगार दे नहीं सकती,
क्यों पलायन का रोना रोते हो A
मूलभूत सुविधाएँ   सुधर नहीं   सकती,
क्या योजना बनाते हो A
योजनाओं के पैंसे हजम करके ,
लम्बी डकार मार जाते हो A
कोन सी लोटरी लग जाती है,
पांच साल में अरबपति बन जाते हो A

रचना -: बलबीर राणा "भैजी"
०९ अगस्त २०१२

1 comments:

बिखरे हुए अक्षरों का संगठन said...

बलबीर भाई जी आपकी बातों में सच्चाई छलक रही है बेहतरीन अभिव्यक्ति
ये पंक्तियाँ तो उम्दा है ..........
भूल गए उन बलिदानों को ,
उत्तराखंड जिन्होंने बनाया है
आज तक न्याय दे नहीं सके ,
मरहमपट्टी कब तक लगोगे
जनता को बरगलाना, सुर्ख़ियों में रहना,
ऐसे विकाश पुरुष कहलाते हो
वोट मांगने के सिवाय इलाके में ,
दुबारा नजर नहीं आते हो