Sunday, 16 September 2012

रूद्र रूप

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रूद्र तेरे रूप ने कल के
हंसते खेलते जीवन को
आज !!!!!
शोकसंतप्त बिरानी में बदल दिया।
गिददों का अकाट्य जमवाडा
हाहाकार मचाता
क्रुर………… क्रन्दन
अपराधी बनी बिद्याता
निठली मूक खडी है
अश्रु भरे चेहरों को
आक्रोषित नजरों से घूर रही है
प्रकृति तेरे धुर्त अकर्मण्य कर्म ने
चहकते चमन,
महकते आंगन को
रिसता रगड बना बना दिया
जहाँ अब जीवन के अवशेष
मिटटी गारों के साथ पुल-पुल करते बह रहे
रात झींगुरों का सुर,
दुखी दिलों को चीर रहा
अरे !
यह सन्ताप !!!!
र्निदोशों को क्यों दे गया?
प्रकृति तेरे रूद्र रूप से
भ्रष्टाचार रथ के सारथी आने वाले हैं
त्रासदी भरे मातम में अपना रथ चलाने वाले है
तेरे कर्म पर राज रोटी सेंकने वाले हैं
कुछ राहत के छीटें मार ………. मानवता की इतिश्री करने वाले हैं
दुखीयों के नाम खुद का घर भरने वाले हैं
तु ही बता
किस रूद्र रूप का सामना करें ?
तेरे या खुद के ......
(रगड = भुस्खलन के बाद की जमीन, पुल-पुल = आहिस्ता खसकती जमीन, गारे = छोटे कंकड पत्थर)
बलबीर राणा "भैजी"
१६ सितम्बर २०१२ 



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