Sunday, 16 September 2012

सुर में पहाड़ की वेदना ताल में दर्द

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उनके गीतों और  रचनाओं  में समाता उत्तराखंड,
 उनकी भिव्यक्ति  में निर्विकार पहाड़ी  जीवन 
हर शब्द में झलकती  उत्तराखंडी संस्कृति 
सुर में पहाड़ की वेदना
ताल में दर्द
प्रखर  उत्तराखंडी आवाज
जिस आवाज से 
हडकंप मचता राजसत्ता में
कुशासन की  कुर्सी हिलती 
उस कंठ से निकलती 
माँ बेटियों की संवेदनाएं 
प्रेमी  दिलों की चंचलता 
दिखता  मनमोहक उत्तराखंडी  छटा का विह्ंगम  दृश्य 
किस ओर उनकी नजर नहीं जाती 
कण कण में होते क्षण क्षण में होते 
हर जगह व्याप्त उनकी उपस्थिति 
ऊँचे हिवांली काठियों में 
रोंतेली घाटियों में 
कल कल करती श्वेत गंगा यमुना के प्रवाह में 
बिपुल पहाड़ी गाँव में विचरण  करती लय
सुरों से  सुमन  खिलते जवान दिलों में 
फिर अठ्लेलियाँ लेता बूढा जीवन 
झूम उठती माँ की ममता 
हे गढ़ पुरुष उत्तराखंडी  शिरमोर 
तुझे कोटि कोटि प्रणाम 

बलबीर राणा "भैजी" 
१४ सितम्बर २०१२ 

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