Saturday, 19 January 2013

तृष्णा भरे जीवन की तृप्ति


उमड घुमड काले मेघों की
घोर गर्जना सुन प्यासा चातक
निराश की निन्द्रा से जागा
सचेत मन
प्यास ब्याकुल
सूखी आँखे
काली घटाओं को निहारती फिरती
तरंगित शरीर आशमान में नाच उठा
आज इन्द्रदेव प्रसन्न होने वाले हैं
झमाझम बौछारे के साथ बरसने वाले हैं
कई दिनों की प्यास बुझने वाली है
मस्त मंगल चातक दल झूम उठा
ये क्या?
निरदयी पवन का झोंका आया
उग्र गति से बदलियों को उडा ले गया
आशाओं पर तुषारपात कर गया
ऐसे ही हवा इन चातकों के जीवन में
आती जाती क्षणिक जगी
आश को तोड जाती
फिर भी चातक दाना चुगना
बन्द नहीं करता
जीवन रूपी युद्ध से मुंह नही मोडता
आशा और उमंग से फिर
बादलों से भरे आशमान को निहारते हुए
तृष्णा भरे जीवन को
तृप्ति से जीता

नवम्बर 2012

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