Sunday, 26 May 2013

हर्षित प्रसंचित 
धरा की विह्ंगमता देख 
मन उमंगित 
पर !!!! कौतुक बरकरार 
क्यों ? नहीं हमारे मन 
इस धरती की तरह मनोरम और निर्मल होते…

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