Monday, 24 June 2013

पर्वतराज तेरा कराल स्वरुप




युग-युग से तु अजर-अमर, युग-युग से अजेय रहा    
जटा-लता से लिपट अडिग, प्रांगन तेरा शुचित रहा  

सोम्य, शांत आँचल गिरिवर, अखंड तेरा वक्ष रहा
चिर समाधि में लीन यति, आशीष तेरा भारत पर रहा

जब मनुष्य इस युग का, स्वयं श्रृष्ठी निर्माता बन चला  
अखंडता तेरी विखंडन कर, अचल तन्द्रा विचल करने चला

विकाश के महल सजते गए, छेदन पर छेदन, तेरा होता गया   
दर-दर कोलाहल, कलिकाल का सुन, मौन तेरा भंग होता गया

मद के लोलुप विकाश दूत, मणीया तेरी लूटते रहे
मंच विनाश लीला का, तेरे मस्तक सजाते रहे

शक्ति क्षीण होती देख, तुझ नगपति का धैर्य खोता गया
रौद्र तेरा रुद्र, रूप बन, दूषित आँगन शुचित कर गया



पर्वतराज तेरा कराल स्वरुप,
अधर्म निर्लिप्तता से,
जग को जगा गया
आधुनिकता, खंडित जीवन अपना देख,
फिर तुझे समझने को बाध्य हुआ     

 

२४ जून २०१३
....... बलबीर राणा “भैजी”
 सर्वाध © सुरक्षित
      
 



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