Saturday, 28 September 2013

गोपियों का सन्ताप



मन कवलित और क्षोभ सन्ताप,
विरह बेदना का करुण  बिलाप
प्रमाग्नि से ज्वलित तन,
यादों के दग्द दग्दित आज मन

जब जीवन के उषा काल में प्रेम का भोर था,
उमंग से यौवन का, थमता नहीं शोर था
उन यवनिकाओं के चंचल कलरव से,
गुंजित बृंदाबन का ओर- छोर था

कान्हा बांसुरी बजाते, रांस रचाते,
गोपियाँ क्या खग-मृग भी, मुग्द हो जाते
अथाह प्रेमवायु संग झूमती सबकी काया,
हर घडी, पल गुजरता त्योहारों वाला

अब क्षितिज पर प्रीत किरणों का अवसान है,
सूना पड़ा बृंदाबन वियोग व्यथा का गान है    
क्यों छोड़ गए मुरलीधर प्रेम चिंगारी तुम,
गुमसुम अग्नि जलन से जल रही हम

© सर्वाध सुरक्षित
.... बलबीर राणा “अडिग”  

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