Thursday, 17 October 2013

गढ़रत्न, गढ़पुरुष



वों का गीतों मा समयुं उत्तराखंड
वों की अभिवक्ति निर्विकार पहाडियों जीवन
हर शब्द मा उत्तराखंडे संस्कृति, संस्कार
सुर मा पहाड़े वेदना
ताल मा पीड़ा
पीड़ा बेटी- ब्वारियों की
पीड़ा ब्वे-बाबा की
ददा-दादीयों की रौंस
धै पहाड़ पहाड़ियों की   
धै भैजी-भूलों की
धै कुटुम, गौं, ख्वालों की
हे हिमालय पुत्र
अडिग तेरु सन्देश
अडिग उत्तराखंडी संस्कृति कु प्रहरी
तेरी धै सूणी
भिभ्डाट मची जांन्दू राज सत्ता मा
कुशासने कुर्शी हिल्दी
कुणा लुकी जांदा चोर-बिराला
कु बाटू नि देखी तेरी अंखियों न
कु भोंण नि पुरियायी तेरा कंठ न
उत्तराखंड की स्वाणी मुखडी
तेरा ज्यू की किताब मा दिखेंदी
तेरी नजर
कख नि जांदा
तेरु पराण
कख नि होन्दू  
रोंत्यला डांडियों मा
गंगा जमुना का निर्मल पाणी मा
बिपुल घर-कूड़ी, गौं-गुठियार मा
घुमणु रैन्दु वा भोंण
ते भोंण से फूल खिल्दा बांजा ज्यू मा
काब्लाट ह्वे जान्दु बुडडया पराण मा,
रूठी ब्वे की ममता नाचण बैठ जांदी
हे गढ़रत्न, गढ़पुरुष उत्तराखंडी शिरमोर
त्वेतें कोटि कोटि प्रणाम, प्रणाम,

२.
सबुं की अन्वार त्वे मां
सरु उत्तराखण्ड त्वे मा
सुखीयों कु सुख त्वे मां
दुखीयों कु दुख त्वे मां
डाडियों की रौनक त्वे मा
कांठीयों की चमक त्वे मां
पलायन की पीडा त्वे मां
बेरोजगार की संवेदना त्वे मां
गौं कु दर्द त्वे मां 
दाना सयोणु की लाचारी त्वे मा
ब्वे की ममता मां
पिता कु दुलार मां
ध्याणी की पीडा मां
भैजीयेां  कु प्यार मां
ज्वान खुदेड ब्वारी माया मां
फौजी भुला की ज्वानी मा
मायादारों की माया मां
नयुं ब्यौ कु उलार मां
बुडिडयों की रस्यांण मां
जख देख तख तुम
उत्तराखण्डियों दिल मा तुम
मन मां तुम
हे गढ रत्न
जतगा बोला उतगा कम
अब शब्द नी बलबीर भैजी  मा
इत्गा शाल बटि तेरी जगेयीं यु जोत
जै का उज्याला मां
उत्तराखण्ड की सस्कृति चमकणी चा
जुग - जुग जियां जुगराज रय्यां


आपकू -: भुला
बलबीर राणा “अडिग”  
         

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