Friday, 24 January 2014

कषिश

तुमसे मिलने की कशिष कशिष ही रह गयी
तन्हायी की तम्नाये अधूरी छूट गयी
कब भीगेगा प्रेम फुहारों से ये आँगन
पूरी उम्र घटाओं के इन्तजार में कट गयी
बदलियो तुम्हें रोज दिल के करीब से जाते देख मन मचल जाता है,
जैसे छूने को हाथ बढाता, वैसे भ्रम टूट जाता है,
पर्वत से मिले बिना तुम, दूर आसमान में उड़ जाती हो,
एक बूँद तो बर्षा जाते निश्ठूरो, इस प्यासे चातक को क्यों हर रोज तरसा जाती हो।
सूरज तुम रोज सुबह आकर दिल के अंधियारे को रोशन कर जाते हो,
कि अब रास्ता उसके घर का ढूंढ ही लूंगा आस मन में जगा जाते हो,
भटकता भटकता जब उस नूर के करीब पहुँचने वाला होता,
लेकिन शाम होते ही आप भी, सामने वाली पहाड़ी से टाटा कर जाते हो।
दुनिया के प्रेम को शीतल छांव से सवांरने वाली चन्दा,
कब तक बिरान रहेगा ये आशियाना मेरा उसको

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