Friday, 6 June 2014

अक्षरों का जाल

अंतःकरण के तीन बिम्ब
मन, चंचल अस्थिर
बहिर्मुख है
बुद्धि गंभीर
अंतर्मुखी
और हृदय भावुक
सब,
अपने-अपने प्रभाव से
अक्षरों को गुंथ रहे
ताकि
जीवन एक सुन्दर कविता बने सके
लेकिन!
देशकाल की गिरगिटी चाल
तीनो को भ्रमित कर
पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर
लगवा रहा
जीवन ना कविता बन पा रही
ना ही किताब
बस बन रहा तो
केवल!
अक्षरों का जाल ।


© सर्वाधिकार सुरक्षित
....बलबीर राणा “अडिग”

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