Friday, 12 September 2014

मैं हिन्दी हूँ


अतुल्य स्वर व्यजनो की तान रही हूँ
एक सभ्य समाज की पहचान रही हूँ
ठुकरायी जा रही हूँ अब अपने ही घर से
अपने नहीं अपनों के लिए परेशान रही हूँ।

अडिग हिमालय की शान रही हूँ
विश्व बन्धुत्व की मिशाल रही हूँ
शुद्ध अक्षतों में मिलावट से
पहचान अपनी नित्य खो रही हूँ।

दुत्कार की पीड़ा हर पल दुखाती
मात्र मुँहछुवाई अब नहीं सुहाती
घर की जोगणी बाहर की सिद्धेश्वरी
सौतन की डाह अब सह नहीं जाती।

राष्ट्र भाषा हिन्दी हूँ आपकी गैर नहीं
सीखो जग की भाषा उनसे मेरा बैर नहीं
मेरे देश में मेरा पूर्ण अधिकार दे दो
अस्तित्व संसार में तुम्हारा मेरे बगैर नहीं।

वर्ष में एक दिन मेरे नाम का मनाकर
कर्तव्यों की इति श्री आखरी कब तक
फिरंगी अंग्रेजी को सर्वमान्य मान कर
मेरी बेरोजगाऱी आखरी कब तक
मेरे साथ मेरी बहनों को मान देना होगा
मेरे देश में मेरी शिक्षा को सम्मान देना होगा।

रस, छंद, अलंकार की अलौकिकता मत भूलो
सूर कबीर की अमृत वाणी मत भूलो
कितने जतन से संवारा महादेवी ने
भारुतेंदु, मुंशी प्रेमचन्द का सृजन मत भूलो।

सुन लो भारत वासी मेरी पुकार
मैं हिन्दी हूँ भारत की बिन्दी हूँ
सजता है भाल भारत माँ का मुझसे
अडिग कलमकार की जिन्दगी हूँ।

रचना:- बलबीर राणा "अडिग"
©सर्वाधिकार सुरक्षित

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