Tuesday, 25 November 2014

तन्हाई संग - ३

तन्हाई संग मूक बन चलता गया
दिन ढलते रहे रातें खुलती गयी
ना सूरज ने पूछा ना चन्दा ने जाना
तारों संग बतियाते रातें खुलती गयी
मनुष्यों के जंगल में भटक भटक
सारथी जीवन का ढूंढता रहा
चहुँ और कोलाहल था गिद्दों का
मांस की इस काया को बचाता रहा
जीवन के अवशेष खोजते खोजते
ना जाने कब इतनी दूर चला आया
मुड के देख रहा हूँ उन रास्तों को
जिनको नापते नापते यहाँ पहुँचा 
सोच रहा हूँ अडिग तूने क्या पाया
खुद को बिराने जो  में खड़ा पाया

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