Sunday, 17 January 2016

सैनिक उद्गीथ



कोमल कोंपल राह ड़ाल की दौड़ने जब चला
यौवन नयी उमंग लिए नयी राह की और बड़ा

मधुरिम गीत जीवन के लिखने को सोचा था
नव चित प्रेम व्यंजना को पढ़ने जो लगा था
चातक की प्यास लिखुंगा भंवरे का गुंजन
बाँधूंगा बासंती चपलाहट को अक्षरों के बंधन।

पनघट पर नटखट यौवना का नाटक रचुंगा
अकेली बिहरन के गीतों को सुंदरबन गुंजाऊंगा
अथाह उमंगे थी यौवन की बृन्दाबन नाचने की
नहीं पता था चिंगारी अंदर सुलग रही देशभक्ति की।

सीड़ी से कूद पड़ा यौवन बन्दूक थामने ले लिए
निर्वसन हुयी मधुरिम गीतों की तान अपना मुँह लिए।

मंजुल भाव अंकुरित हुए थे जो रुपहले यौवन में
पनपते ही भेंट चड़ा आया मातृभूमि को दिए वचनो में
अब रुपहली वही स्वेत बर्फ की चोटियां लगती
जहाँ से देखता दिव्य भारत की तस्वीर मन में।

दो दिनी मुखोटा पहन लेता हूँ गृहस्त यात्रा में
फिर बनवासी बन जाता हूँ अनजाने सघन में
तमन्ना नहीं अब किसी प्रियसी के वहुपास की
अथाह प्रेम हो चला मातृभूमि के क्षितिज निर्जन में।

अब कारुण्य कल्पना के चित्र घूमिल हो गए चितवन में
अक्षर संवेदना के संज्ञा रहित, चिर निंद्रा पड़े भाव पलकन में
जिजीविषा की जद्दोजहद में सतरंगी जीवन सपना लगता
खुशहाल रहे वतन मेरा यही कर्मक्षेत्र अब अपना लगता।

रचना:- बलबीर राणा ‘अडिग’



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