Thursday, 24 August 2017

बच्चे


तब काख नीचे थे अब कंधे से ऊपर हो गए।
सच में तब मासूम थे बच्चे, अब मस्त हो गए।

वे बढ़ते चंद्र चरण में हम घटते चरण निहार रहे
रस भरे उन्मुक्त मधु मास में जीवन बिहार रहे
कांधे पर बिठा कर मेले की भीड़ दिखाता था जिन्हें
वे आज भीड़ से हाथ पकड़ खींचने वाले हो गए।
सच  में तब मासूम थे बच्चे, अब मस्त हो गए।

बीज माली-मालिन की अभिलाषा तृप्त कर गए
बगिया में अकुंर दे जीवन की आश जगा गए
प्रेम की छांव में सींचे अंकुर, चुल-बुल पौधे थे कभी
तब हाथ देती थी बेलें अब ठंगरों से ऊपर हो गए।
सच में तब मासूम थे बच्चे, अब मस्त हो गए।

बिस्तर की वो उछल-कूद अब छलांगे हो गए
छुपन छुपाई वाले छुपके बात करने वाले हो गए
तोतली जिद्द से घोड़े बनाने वाले नन्हे बादशाह
अब सबल-संभल के लगाम संभालने वाले हो गए
सच में तब मासूम थे बच्चे, अब मस्त हो गए।

जब तक थे पिताजी वर्षफल हमारा पूजते रहे
हमारी खुशी में वे अपना पूजना भूल गए
आज हमारा भी त्यौहार बन गया पूतों का जन्म दिन
इस खुशी में हम भी अपना मनाना भूल गए।
तब काख नीचे थे अब कंधे से ऊपर हो गए।
सच में तब मासूम थे बच्चे, अब मस्त हो गए।

ठंगरे = बेल को सहारा देने वाली टहनियां
25 अगस्त 2017
बेटे संजू के 17वें जन्म दिवस पर
@ बलबीर राणा अडिग

1 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन महिला असामनता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।