Tuesday, 31 October 2017

उषा की पुरवायी



पूरब क्षितिज के ओट से
कमसिन किरण वो आती है
जगमग स्वर्ण आभा से
धरती की अलस भगाती है।

झूम उठते तरु-पादप
बहने लगती मंद पवन बयार
नन्ही चिडया की चह-चहाहट
गुड़िया को विस्तर से जगाती है
पूरब क्षितिज की ओट से ......

कमसिन पादपों का आगोस
भाग जाता निशा अहलाद
हरित तरुण तृणों के फलक पर
ओश की बूंद चमकाती है
पूरब क्षितिज की ओट से......

पुलक उठता धरा का पोर-पोर
नव उंमग नव शक्ति ऊर्जावान
खिलखिलाते बगिया के फूल
गीत दिवस का गाती है
पूरब क्षितिज की ओट से.....

अंगड़ाई मत ले लल्ला
उठ जग-जतन जोड़
उषा की यह पुरवायी
जीवन सीद्धि  देती है
पूरब क्षितिज की ओट से.....

@ बलबीर राणा 'अडिग'

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