Saturday, 3 February 2018

बीस हजार की सिगरेट


 हठो हठो बामण जी आ गए उन्हें काम करने दो, बेहोस पान सिंह की माँ चैता रोती हुए बोली पंण्ज्यू कल देवी का डोला रखने गया था मेरा लड़का शाम को कडकडू (बेहोश) हो गया, भद्र डांडे बयाळ (बन देवी की हवा) लग गयी मेरे पानू पर, हे !! भगवान ठीक कर दो मेरे लड़के को जो मांगेगा दे दूंगा। पंडित जी ने गरुड़ पंख, कंडाली के पत्ते में राख और एक लोटे पर पानी मंगाया और अपनी पौथी निकाल झाड़ा (तंत्र कर्मकांड) डालने लग गया, ॐ हर दत्त को आदेश, डाकनी शाकिनी छू मंतर ॐ...होम क्रीं आँचडी-बयाल छू मंतर... बीच-बीच में सौलह वर्षी पान सिंह अचानक हिचक्की लेता और शांत हो जाता सभी लोग मंत्रों के असर का इंतजार कर रहे थे, बामण के मंत्र खत्म हो गए और कहा सब झाड़ दिया है बयाल का असर कुछ देर और रहेगा घबराने की बात नहीं मैं पूछ (देव अवतारी खोज) डालकर बताता हूँ कहाँ की बयाल है। पल डांडा (उधर का पहाड़ की) या वल डांडा (इधर के पहाड़ की)। तभी गांव के मास्टर जी कंपाउंडर को ले आये, उन्होंने नब्ज देखी हाल जाना और बी पी चैक करने के बाद गलूकोज स्लाइन लगा दिया और कहा गर्मी चढ़ी है मस्तिष्क में लगता है कुछ नशा किया इस मास्ता ने,  कौन थे रे साथ? साथ वाले क्या बताते सब ना नुकर कर पीछे छुप गए, मंगतु मन ही मन कह रहा था उस समय तो कमीना सिगरेट छोड़ ही नहीं रहा था, आते वक्त पूरे चार सिगरेट पियर सुल्पा (भांग) पिया अपने हाथ का सिरगाड़ वाला, लेकिन डर के मारे बताये कौन। बक्या ने भी दोखै (ऊन का बिछौना) में आसन लगा दिया, परिवार वाले और गांव के बड़े बूढे बक्या के सामने हाथ जोडे बैठ गए। ॐ थ्रू ॐ हट करते हुए पंडित जी ने गर्दन झटकते हुए चूल (चोटी) खोली और थाली से चांवल उछालते हुए कंपकंपी आवाज में कहा ऐड़ी....आँछड़ी...(बन देवियां) नहीं सिर.. सिर... गाड़ का मशाण (भूत) लगा है, इसका.. पैर...फिसला है...और शरीर... शरीर...में हिर्र...हिर्र हो गयी। तभी पीछे से मंगतु ने हाँ प्रभो सही है में स्वीकृति दे दी, वही पानसिंह के साथ डोली में आगे से लगा था, मना करता तो कंपाउंडर की दुबारा रेड पडती, पल्ला जो छुड़ाना था। शनिवार को दो बकरे के साथ मशाण पूजना तय हुआ, सिर गाड़ का मसाण खरतनाक होता है दो बकरे से कम नहीं मानता। सोबन सिंह ने पांच का सिक्का निकाला और पंडित जी को उच्चयाणा (बचन) करने को कहा। शाम तक पांच बोतल एन एस, डी एन एस दो इंजेक्शन एन्टी ड्रग के साथ चढ़ गए थे और पानसिंह ने आंखे खोल दी थी लोगों की भीड़ को एक टक देख रहा था चरस का नशा जो था। पंडित जी फिर दो बार झाड़ दे गए थे। दूसरे दिन गांव के लगभग सभी मर्द और सयाने बच्चे सिर गाड़ की धार (रिज लाईन) पहुंच गए आठ-आठ हजार के दो मस्त बकरे आ रखे थे, चैता कह गयी थी कमजोर बकरे मत लाना मेरा लड़का ठीक हो जाना चाहिए छक धिताणा (पूरी धीत देना) उस मसाण को। अगले दिन मसाण पूजा हुई सिरी-फट्टी (बकरे का सिर और एक टांग) बामण ले गया ऊपर से पांच सौ दक्षिणा, मैण-मसाले,  हलवा पूरी और पूरी दस लीटर कच्ची !भाई दो बकरे भी तो पचाने हैं, नहीं तो मसाण नहीं तूसेगा मीट घर ले जाना बर्जित है। मंगतू, देबू और करणि ऊंचे ढुंगे (पत्थर) में कचमोली (भुना हुआ कच्चा मीट) चाव से चबाते गप्प मार रहे थे, अरे बेटे पान सिंह की सिगरेट बीस हजार की पड़ गयी यार, अब नहीं करना ऐसा काम।
@ बलबीर राणा 'अडिग'

2 comments:

Kavita Rawat said...

बड़ी बिडम्बना है
खाने-पीने के बहाने जबरदस्ती झाड़-फूंक वाले सीधे साधे लोगों को यूँ ही आसानी से बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं
सटीक लिखा है आपने , जागरूकता जरुरी है

Gireesh Chandra Nautiyal said...

बहुत ही सुंदर और सजीव वर्णन ग्रामीण परिवेश का परंतु वास्तव में अब समय आ गया है कि अब इस परिपेक्ष में खुल कर चर्चा होनी ही चाहिए क्योकि गाँव में इस झाड़-फूक के चक्कर में बहुत घन खर्च होता है और कोई प्रत्यक्ष लाभ नही होता है | भ्राता श्री मेरा आपसे अनुरोध है कि कहानी के अलावा इस विषय पर आलोचनात्मक लेख भी लिखे| 🚩जय हिंद 🚩जय भारत 🇮🇳